Rajdeep Sardesai’s column – This is not the right time to play cricket with Pakistan | राजदीप सरदेसाई का कॉलम: पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने का यह सही समय नहीं

- Hindi News
- Opinion
- Rajdeep Sardesai’s Column This Is Not The Right Time To Play Cricket With Pakistan
5 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
पहलगाम हमले के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते और ऐसा कहते हुए उन्होंने सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया था। बहरहाल, पानी भले ही खून के साथ नहीं बह सकता, लेकिन खेल जरूर उसके साथ हो सकता है।
कुछ ही दिनों बाद एशिया कप शुरू होगा और सभी की निगाहें भारत-पाकिस्तान के अहम मुकाबले पर टिकी होंगी। सरकार ने इन मैचों को यह कहते हुए हरी झंडी दे दी है कि द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मुकाबलों में फर्क है।
देखें तो सरकार 2012 से चले आ रहे उन अलिखित दिशानिर्देशों का ही पालन कर रही है, जिनके चलते दोनों देशों के बीच केवल वैश्विक टूर्नामेंटों में ही क्रिकेट मुकाबले हुए हैं। भारत-पाक खेल संबंधों का एक लंबे समय से समर्थक होने के नाते मुझे तो बिना किसी हिचकिचाहट के सरकार के रुख का स्वागत करना चाहिए। आखिर क्रिकेट का खेल ही तो है, जो उपमहाद्वीप के देशों को आपस में जोड़ता है। इसमें भी भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मुकाबलों ने खेलप्रेमियों को कई यादगार लम्हे दिए हैं।
और इसके बावजूद, इस बार की बात अलग है। मैदान में वो दो टीमें आमने-सामने होंगी, जिनके देश अभी कुछ महीने पहले परमाणु युद्ध की कगार पर थे। आप कह सकते हैं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों का पाकिस्तान की हुकूमत और फौज की साजिशों से क्या लेना-देना? क्या खेलों की शुचिता को पाकिस्तान के उस सत्ता-प्रतिष्ठान से अलग नहीं रखा जा सकता, जो भारत को ‘हजार घाव’ देने पर तुला रहता है?
सैद्धांतिक रूप से हां, लेकिन वास्तव में नहीं। पहलगाम हमले के बाद, पाकिस्तानी क्रिकेट की किसी भी जानी-मानी आवाज ने भारत के लोगों के प्रति सहानुभूति का बयान नहीं दिया था। शाहिद अफरीदी ने तो उलटे भड़काऊ बयान देते हुए भारतीय सेना को ही आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया था। वे अकेले नहीं थे।
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख मोहसिन नकवी- जो शाहबाज शरीफ सरकार में मंत्री भी हैं- ने कहा था कि भारत में हमसे क्रिकेट खेलने से इनकार करने की हिम्मत नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं इसके क्या परिणाम होंगे।
पीसीबी प्रमुख के भड़काऊ बयानों से पता चलता है कि पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान में नई दिल्ली के प्रति दुश्मनी की भावना कितनी गहरी है। ठीक है कि हमारे देश में भी कुछ उग्र लोग हैं, जो पाकिस्तान के ‘खात्मे’ की चाहत रखने वाले एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीमा के दोनों ओर मीडिया द्वारा जो दुष्प्रचार अभियान चलाया गया, वह संस्थागत आचार-संहिता के पतन को दर्शाता है। हमारे एक टीवी एंकर ने तो गरजते हुए कह दिया था कि ‘अमन की आशा को ब्रह्मोस की भाषा ने दफना दिया है!’
लेकिन युद्धोन्माद के इस दौर में क्या भारत-पाक क्रिकेट मैच मरहम का काम कर सकता है? दुर्भाग्य से नहीं। मुझे याद है कि 2004 में मैं पाकिस्तान गया था। तब भारत ने न केवल पहली बार पाकिस्तान को उसी की धरती पर टेस्ट शृंखला में हराया था, बल्कि उस समय पाकिस्तान के लोगों में भारतीय टीम के प्रति गर्मजोशी का भी संचार हुआ था।
मुझे याद है मैं लाहौर में उन्मादी पाकिस्तानी प्रशंसकों से घिरा था, जो ‘बालाजी, जरा धीरे चलो’ गा रहे थे। मुझे यह भी याद है कि 1999 में एक टेस्ट मैच में भारत को मामूली अंतर से हराने के बाद चेन्नई की भीड़ द्वारा कैसे पाकिस्तानी टीम का खड़े होकर अभिवादन किया गया था। लेकिन सद्भाव के वो पल क्षणभंगुर साबित हुए।
सच तो यह है कि आज भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बिल्कुल भी सामान्य नहीं हैं। ऐसे में क्रिकेट सामान्यता का बनावटी एहसास दिलाने का जरिया भर बनकर रह जाएगा। खिलाड़ियों से अपेक्षा की जाने लगती है कि वे योद्धा बनकर बल्ले और गेंद से ‘युद्ध’ छेड़ें, जबकि दर्शक इन मुकाबलों पर फलने-फूलने वाले क्रिकेट के इकोसिस्टम द्वारा राष्ट्रीय उन्माद के अकल्पनीय दौर में धकेल दिए जाते हैं।
यह अकारण नहीं है कि लगभग हर वैश्विक टूर्नामेंट में भारत और पाकिस्तान को हमेशा एक ही ग्रुप में रखा जाता है। भारत-पाकिस्तान का मैच दो हफ्ते तक चलने वाले एशिया कप के बाकी सभी मैचों की तुलना में ज्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित करेगा और इसी के साथ विज्ञापन-राशि बढ़ेगी।
आम भारतीय और पाकिस्तानी पहलगाम में हुई हिंसा के बाद एक-दूसरे के परिवारों से मिलने के लिए वीसा तक नहीं पा सकते, लेकिन दोनों देशों के क्रिकेट बोर्ड के वीवीआईपी अधिकारी एयर-कंडीशंड कमरों में खुशी-खुशी एक-दूसरे से मिलते रहेंगे। खून और पानी भले ही साथ-साथ नहीं बह सकते हों, लेकिन पैसों का रंग तमाम सीमारेखाओं को लांघ जाता है!
आज भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सामान्य नहीं रह गए हैं। ऐसे में क्रिकेट सामान्यता का बनावटी एहसास दिलाने का जरिया भर बनकर रह जाएगा। खिलाड़ियों से अपेक्षा की जाने लगती है कि वे योद्धा बनकर बल्ले और गेंद से ‘युद्ध’ छेड़ें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source link