N. Raghuraman’s column – Are you dressed respectably? | एन. रघुरामन का कॉलम: क्या आपने सम्मानजनक तरीके से कपड़े पहने हैं?

1 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
इस हफ्ते दुनिया भर में लाखों लोग अपने रिश्तेदारों के साथ ‘थैंक्सगिविंग डे’ मनाने गए, जो इस गुरुवार को था। सिर्फ अमेरिका में ही 3 करोड़ से ज्यादा लोगों ने फ्लाइट्स पकड़ीं। उनमें से एक अमेरिका के परिवहन मंत्री सीन डफी भी थे। इसी हफ्ते डफी और उनके विभाग ने एक ‘सिविलिटी कैम्पेन’ शुरू किया।
कैम्पेन का एक वीडियो भी है, जिसमें उन दिनों को याद किया गया है, जब यात्री अच्छे से तैयार होकर फ्लाइट में चढ़ते थे। सूट-टाई वाले उन दिनों की तुलना आज के दृश्यों से की गई है, जिनमें पजामा पहने लोग गलियारे में झगड़ते हैं। फ्लाइट अटेंडेंट से उलझते, नंगे पांव घूमते दिखते हैं। बीते पांच सालों में फ्लाइट से यात्रा करने वाले लोगों को यह सारी बुरी बातें आज के आधुनिक अनुभव के तौर पर झेलनी पड़ी हैं।
वीडियो में डफी पूछते हैं कि ‘क्या आप सम्मानजनक कपड़े पहन रहे हैं? क्या आप बच्चों पर कंट्रोल रख रहे हैं?’ वस्तुत: उनका सपना है कि ‘यात्री गर्भवती महिलाओं या बुजुर्गों का सामान ओवरहेड बिन में रखने में मदद करते दिखें।’ पूरी यात्रा में अच्छे कपड़ों में रहें। उनका लक्ष्य महत्वाकांक्षी है। वे कहते हैं- ‘आइए, सभ्यता और शिष्टाचार वापस लाएं।’
यात्रा करने में बहुत-सी असुविधाएं हैं। देश भर में हमारी ट्रेनों में देखें। मैंने अपनी हवाई और खासकर ट्रेन यात्राओं में देखा है कि कोच अटेंडेंट अच्छे कपड़े पहने लोगों को साफ-सुथरे चादर-तकिए देता है। कभी एक्स्ट्रा तौलिया भी देता है।
आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि अमूमन अच्छे कपड़े पहनने वालों से अटेंडेंट की बातचीत के लहजे में अंतर साफ दिखता है। दरअसल अच्छे कपड़े हमारे अपने व्यवहार को भी बदल देते हैं। देखिए, अच्छे कपड़ों वाला कितनी बार मुस्कराता है, सभ्य जोक्स सुनाता है और सहयात्रियों के प्रति नम्र रहता है। वो कभी जोर से नहीं बोलेगा। लेकिन कुछेक लोग ऊंची आवाज और तेज आवाज में मोबाइल चला कर ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं। वे चिंतकों, पाठकों और एकांत चाहने वालों को डिस्टर्ब करते हैं।
मैंने सबसे बड़ा फर्क कुछ खाते या रैपर फेंकते वक्त सीट साफ रखने के उनके तौर-तरीकों में देखा। उनके साथ चल रहे लगेज के साइज में तो यह और भी अधिक दिखता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि लोग मुंबई से पटना फर्स्ट क्लास में जलाने वाली लकड़ियां लेकर चढ़ जाते हैं, जिससे दूसरों को असुविधा होती है। वे टिकट एग्जामिनर और सहयात्रियों से अपने हक काे लेकर तो लड़ते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थलों और ट्रेन में यात्रा के दौरान अपने कर्तव्यों की बात कभी नहीं करते।
सभ्यता और सार्वजनिक व्यवहार उनके पास आ रहे बेतहाशा पैसे की बाढ़ में बह गया है। और ये सिर्फ भारत की सामाजिक समस्या ही नहीं, बल्कि जैसा डफी बताते हैं- अमेरिका जैसे सबसे विकसित देश में भी यही हाल है। वो दिन दूर नहीं जब सार्वजनिक स्थानों पर सभ्य व्यवहार करने वालों को अवॉर्ड मिलने लगेंगे। और हमें यह शुरुआत समाज को सम्मान देने से करनी होगी।
अपने ड्रेसिंग सेंस, बाेलचाल के तरीके, व्यवहार और सबसे जरूरी मोबाइल शिष्टाचार से। इसका हमारे आचरण पर गहरा असर पड़ेगा। सोचिए, एक ऐसा प्लेन या ट्रेन जहां सभी अच्छे कपड़ों में हों, धीरे और सभ्यता से बोलें। मैं भी डफी की तरह एक ड्रीमर हूं।
फंडा यह है कि अगर कोई पूछे, ‘क्या आज की अमीर दुनिया ने अपनी सभ्यता खो दी है?’ तो हमारे पास इससे असहमत होने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि हम हर तरफ कैजुअल एटिट्यूड ही देख रहे हैं। चलिए, सिर्फ सम्मान पाने के लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के हर व्यक्ति का सम्मान करने के लिए- अच्छे कपड़े पहनना शुरू करें।
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