Lieutenant General Syed Ata Hasnain’s column: ‘In the army uniform, it’s not your religion that matters, it’s your duty.’ | लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: फौज की वर्दी में अपने धर्म का नहीं, ड्यूटी का महत्व है

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3 घंटे पहले
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेशन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सशस्त्र बलों में निजी आस्था और पेशेवर दायित्वों के बीच रिश्ते को लेकर जरूरी बहस छेड़ दी है। उन्हें धार्मिक परेड में शामिल नहीं होने और मंदिर, गुरुद्वारा जैसे रेजिमेंट के पूजा-स्थलों में प्रवेश से बार-बार इनकार करने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था।
उनका कहना था कि ऐसा करना उनकी एकेश्वरवादी आस्था के खिलाफ है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उनका रुख रेजिमेंटल एकजुटता को कमजोर करने वाला था। कोर्ट ने इसे घोर अनुशासनहीनता करार देते हुए उनकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।
यूनिफॉर्म में निजी आस्था संस्थागत कर्तव्य पर हावी नहीं हो सकती। भारतीय सेना किसी भी दूसरे संस्थान की तुलना में सेकुलरिज्म के एक अनूठे मॉडल पर निर्मित हुई है। इसमें उपेक्षा नहीं, समावेश है। रेजिमेंटल मंदिर, गुरुद्वारा, सर्व-धर्म-स्थल, यूनिट चर्च पहचान, परंपरा, मनोबल और साझा उद्देश्यों के प्रतीक हैं।
मैं रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट स्कूलों में पढ़ा हूं। सेना में अधिकारी रहे मेरे पिता और मां सहज रूप से रेजिमेंटल मंदिरों, गुरुद्वारों और यूनिट चर्च आते-जाते थे। मेरी परवरिश इस्लाम में हुई है, लेकिन बचपन से ही मैंने देखा कि सेना में धर्म बांटता नहीं, बल्कि एकजुट करता है। और मेरे 40 साल के करियर में मैंने इसी पर अमल किया।
एक युवा कंपनी कमांडर और बाद में तमाम ऑपरेशनल परिस्थितियों में कमांडिंग ऑफिसर के रूप में मैं यह जरूर सुनिश्चित करता था कि हर ऑपरेशन की शुरुआत और अंत सैनिकों द्वारा बनाए मंदिर में संक्षिप्त सभा से हो। इसलिए नहीं कि वह मेरी रीति थी, बल्कि इसलिए कि वह ‘हमारी’ रीति थी!
फौज की संस्कृति का सार यही है कि आप अपना धर्म छोड़ते नहीं, बल्कि उसका पालन अलग तरीके से करना सीख जाते हैं। तब वह निजी, विविधतापूर्ण और गरिमामयी बन जाता है। एक अधिकारी का काम जवानों के रीति-रिवाजों को जज करना नहीं, उनके साथ खड़े रहना है। अधिकारी की मौजूदगी मात्र ही जवानों का मनोबल ऊंचा कर देती है। उस वक्त वह ईसाई, सिख, मुस्लिम, हिंदू, पारसी नहीं, लीडर होता है।
कोर्ट ने बिल्कुल ठीक कहा कि संविधान हमारी धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन यह आजादी उस स्तर तक नहीं दी गई है कि किसी नियमपूर्ण आदेश को मानने से इनकार कर दिया जाए। विशेषकर फौज में तो अनुशासन और एकजुटता अपरिहार्य है।
ईसाई धर्म में आस्था रखने वाले सीओ ब्रिगेडियर डेसमंड हाइड ने 1965 में डोगराई की लड़ाई में 3-जाट का नेतृत्व किया था और महावीर चक्र के साथ-साथ अपने जवानों का अटूट सम्मान भी पाया। वे अपने जवानों से भी अच्छे भजन गा लेते थे।
पूना हॉर्स के पारसी अधिकारी और परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर तारापोर अपने धर्म के कारण नहीं, बल्कि आर्मर्ड कोर के महानायक के तौर पर याद किए जाते हैं। सिख रेजिमेंट का नेतृत्व ईसाई और मुस्लिम अधिकारी कर चुके हैं। मेरी रेजिमेंट गढ़वाल राइफल्स की कमान भी हर धर्म के अधिकारियों ने संभाली है।
यह धर्म की नहीं, बल्कि विश्वास की बात है। एक सिपाही अपने अधिकारी का अनुसरण सिर्फ उनकी रैंक के कारण ही नहीं करता, बल्कि इसलिए भी करता है कि उसे अपने अधिकारी के हरदम अपने साथ खड़े रहने पर भरोसा होता है- खतरे में, अनिश्चितता में और प्रार्थना में भी। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला मायने रखता है। यह फौज की अखंडता की पुनः पुष्टि करने वाला निर्णय है। यह व्यक्तिगत आस्था नहीं, सार्वजनिक एकजुटता से संबंधित है।
कोर्ट का यह निर्णय जनता को भी यह समझाने का मौका है कि फौज के जवान इसलिए किसी मंदिर या सर्वधर्म स्थल पर नहीं जाते कि वे किसी धर्म विशेष के अनुयायी हैं, बल्कि इसलिए जाते हैं कि वे एक बिरादरी का हिस्सा हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि क्यों फौजी खतरों की स्थिति की ओर, यहां तक कि सुनिश्चित मौत की ओर भी बेधड़क चल पड़ते हैं। क्योंकि उनका भरोसा एक-दूसरे पर होता है।
मिलिट्री सर्विस शायद एकमात्र ऐसा पेशा है, जहां कोई किसी संस्थान के लिए काम नहीं करता, बल्कि वो खुद एक संस्थान बन जाता है। तब एक बड़े, सामूहिक उद्देश्य के सामने निजी आस्था, पहचान, पसंद और अहंकार- सब दोयम हो जाते हैं।
इसीलिए यूनिफॉर्म में किसी की आस्था नष्ट नहीं, रूपांतरित हो जाती है। उसे ताक पर नहीं रख दिया जाता, उसका सम्मान किया जाता है। जब हम भारतीय सेना की यूनिफॉर्म पहनते हैं, तो ये सवाल अहम नहीं रह जाता कि हमारा धर्म क्या है, बल्कि यह कि हमारी ड्यूटी क्या है!
फौज में आप अपना धर्म छोड़ते नहीं, बल्कि उसका पालन अलग तरीके से करना सीख जाते हैं। तब वह निजी, विविधतापूर्ण और गरिमामयी बन जाता है। एक अधिकारी का काम जवानों की आस्था के साथ खड़े रहना है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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