Virag Gupta’s column – How will the new law end the menace of online gaming? | विराग गुप्ता का कॉलम: ऑनलाइन गेमिंग का मर्ज नए कानून से कैसे खत्म होगा?

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5 घंटे पहले
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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक
ऑनलाइन गेमिंग के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए केंद्र सरकार का नया कानून कितना और कैसे प्रभावी होगा? इससे जुड़े 6 पहलुओं को समझना जरूरी है।
1. लचर कानून : संसद में प्रस्तुत विधेयक में लिखा था कि ऑनलाइन गेमिंग से अपराध, धोखाधड़ी, हवाला, टैक्स चोरी, आतंकी वित्तपोषण की घटनाएं होने और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ने के साथ ही युवाओं का भविष्य भी बर्बाद हो रहा है। नोटबंदी और लॉकडाउन के बाद समाज और अर्थव्यवस्था में ऑनलाइन गेमिंग का मर्ज बढ़ गया। हजार रुपए का जुआ खेलने वालों को पुलिस जेल में डाल देती है। लेकिन ऑनलाइन के संगठित आपराधिक तंत्र को रोकने के लिए पिछले 10 सालों में सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। 26 करोड़ यूजर्स के डेटा के दम पर ड्रीम इलेवन वित्तीय और एआई सेक्टर में प्रवेश की योजना बना रही है। भारत में 45 करोड़ से ज्यादा यूजर्स गेमिंग की लत के शिकार बताए जाते हैं। दो साल पहले डेटा सुरक्षा कानून को संसद व राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई, लेकिन उसको लागू नहीं करने और डेटा के दुरुपयोग से साइबर व वित्तीय अपराध बढ़ रहे हैं। 2. युवाओं की बर्बादी : भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन के अनुसार जंक फूड, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की तिकड़ी से बर्बाद होते युवा नौकरियों के लिए अनफिट हो रहे हैं। गेमिंग कम्पनियां हेरफेर करने वाले फीचर्स, लत वाले एल्गोरिदम, बॉट्स के माध्यम से भारत के युवाओं से सालाना 2 लाख करोड़ की ठगी का कारोबार कर रही हैं। गेमिंग कम्पनियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के बजाय सरकार नए कानून से उन्हें प्रोत्साहन पैकेज दे रही है। 18 साल से कम उम्र के बच्चे गेमिंग कम्पनियों के साथ अनुबंध नहीं कर सकते। तो ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेमिंग की आड़ में नाबालिग बच्चों को गेमिंग के नशे के शिकंजे में क्यों फंसाया जा रहा है? 3. राज्यों के अधिकार : संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार सट्टेबाजी, लॉटरी, जुए पर कानून बनाने और टैक्स वसूली के लिए राज्यों को अधिकार हैं। तमिलनाडु, तेलंगाना, कनार्टक ने कानून से गेमिंग कम्पनियों की नकेल कसने की कोशिश की। लेकिन राज्यों के दखल को रोकने के लिए केंद्र ने 2023 में आईटी नियमों में बदलाव करके गेमिंग कम्पनियों को इंटरमीडियरी का सुरक्षा कवच और स्व-नियमन का विशेषाधिकार दे दिया। नए कानून में गैर-कानूनी ऐप्स को ब्लॉक करने और अवैध पेमेंट गेटवे को रोकने के लिए राज्यों की पुलिस को अधिकार नहीं हैं। 4. कौशल या किस्मत : कौशल के खेल में प्रतिभा और ज्ञान की जरूरत है, जबकि सट्टेबाजी सिर्फ किस्मत पर निर्भर है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के फैसले में फैंटेसी स्पोर्ट्स को स्किल का खेल माना था। नए कानून से मनी गेमिंग पर प्रतिबंध के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई है। कानून में कौशल और किस्मत के फर्क को खत्म करने से अदालती लड़ाई में सरकार का पक्ष कमजोर हो सकता है। दो साल पुरानी रिपोर्ट के अनुसार विदेशी कम्पनियों ने 58 हजार करोड़ की प्राइज मनी पर आयकर की चोरी की थी, लेकिन उसकी वसूली के लिए नए कानून में कोई कार्ययोजना नहीं दिखती। गेमिंग कम्पनियों के खिलाफ 2.5 लाख करोड़ की जीएसटी चोरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट में लंबित फैसले पर भी नए कानून के अनुसार सरकार नए सिरे से हलफनामा दायर कर रही है। इन कंपनियों से अरबों रुपए की टैक्स वसूली में अड़चन आ सकती है। 5. हवाला और आतंकवाद : गेमिंग से सट्टेबाजी के मामले में आंध्र प्रदेश में 29 फिल्मी हस्तियों के खिलाफ ईडी ने पीएमएलए के मामले दर्ज किए। चीनी गेमिंग एप फीविन की ईडी जांच में म्यूल खातों और क्रिप्टो करेंसी वॉलेट के जरिए खरबों के अवैध लेन-देन का खुलासा हुआ था। वैश्विक इंटरनेट फोरम के अनुसार गेमिंग की चैट से युवाओं को कट्टरपंथ और आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है। संसदीय समिति की 2023 की रिपोर्ट और एनआईए की जांचों से भी ये बातें सामने आ चुकी हैं। 6. विदेशी कम्पनियां : नए कानून के बाद विदेशी कम्पनियां वीपीएन और दूसरे अवैध तरीकों से कारोबार बढ़ा रही हैं। आईटी सचिव के अनुसार विदेशी कम्पनियों पर लगाम के लिए इंटरपोल की मदद ली जा सकती है। पिछले 10 सालों में इंटरपोल की ठोस मदद नहीं मिली तो फिर आगे कैसे सफलता मिलेगी? नए कानून के बाद नियम और अथॉरिटी बननी हैं। लेकिन विदेशी गेमिंग कम्पनियों पर नया कानून लागू करना और उनसे टैक्स वसूलना सरकार के लिए टेढ़ी खीर हो सकता है।
हजार रुपए का जुआ खेलने वालों को पुलिस जेल में डाल देती है। लेकिन ऑनलाइन के संगठित आपराधिक तंत्र को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। यूजर्स के डेटा के दुरुपयोग से साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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