भारत-चीन के संबंधों में सुधार और कनेक्टिविटी का वादा – Sadhguru Jaggi Vasudev on India China Relations Connectivity India ntc

एक समय था जब दुनिया में हर कोई, चाहे वह कोलंबस हो या वास्को डि गामा, एक ही जगह जाना चाहता था-भारत।. वे आत्म-ज्ञान की तलाश में नहीं थे. वे धन की तलाश में थे और यह सबसे धनी राष्ट्र था. हम एक जीवंत विनिर्माण और व्यापारिक राष्ट्र थे. हम व्यापार कैसे करते थे? यह पूरब और पश्चिम दोनों दिशाओं में 10,000 से भी अधिक वर्षों से स्थापित जमीनी रास्तों से होता था. मध्यपूर्व के कई शहर भारतीय व्यापारियों पर लगाए गए टैक्स के पैसों से बने थे. उस समय के व्यापार की मात्रा उतनी अधिक थी.
फिर आक्रमण हुए, हम दूसरों के अधीन हो गए और हमारे लिए चीजें खराब हो गईं. आजादी के बाद, तेजी से सुधार होना चाहिए था, लेकिन एक बड़ी बाधा यह थी कि पूरब और पश्चिम दोनों दिशाओं में हमारे व्यापार मार्ग कट गए थे. जो कभी एक उपमहाद्वीप था, उसे हमने एक दुखद विभाजन के कारण एक द्वीप में बदल दिया. एक सभ्यता के रूप में किया गया हमारा यह सबसे अदूरदर्शी काम था.
आज, इस देश में कोई भी व्यापार समुद्री रास्ते ही होता है. हमारा तेल भी, जो प्रति वर्ष लाखों बैरल होता है, समुद्र के रास्ते ही आता है. एकमात्र चीज जिसने हमें बचाया है वह यह कि हम एक सूचना प्रौद्योगिकी राष्ट्र बन गए हैं. दुर्भाग्य से, हम अभी अपनी सीमाओं के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, लेकिन हम भौगोलिक रूप से जुड़े देशों से- चीन, मध्य एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और रूस से अच्छे संबंध बना सकते हैं. हो सकता है कि हमने सीमाएं और राजनीतिक मतभेद पैदा किए हों, लेकिन हम इतनी जल्दी भौगोलिक रूप से डिस्कनेक्ट नहीं होने वाले हैं. तो इन संबंधों का विकसित होना सबसे अच्छा होगा क्योंकि व्यापार और रिश्ते हमेशा भौगोलिक रूप से जुड़े देशों के बीच सबसे अच्छे होते हैं.
इस संदर्भ में, भारत और चीन के बीच रिश्तों का फिर से ठीक होना शानदार बात है, और भारतीयों के लिए कैलाश यात्रा का खुलना निश्चित रूप से विश्वास बनाने का एक तरीका है जो सरकारों और लोगों के बीच भारी सद्भावना और भरोसा लाता है. प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और अन्य पहलुओं के मामले में चीन हमसे काफी आगे निकल गया है, लेकिन भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. दोनों देशों के अपने-अपने फायदे हैं और हमें अपनी ताकतों के आधार पर इस रिश्ते का निर्माण करना चाहिए.
1962 का युद्ध और हालिया गलवान झड़प भारतीय मानस में दर्दनाक घाव हैं. मैं जानता हूं कि भावनाएं जुड़ी हैं, और हमने अपने लोग खोए हैं- 1962 में हजारों और 2020 में बीस आदमी. लेकिन हमें इन घटनाओं से आगे देखना होगा क्योंकि अगर हमारा शक बना रहता है और हम एक खास स्तर की कटुता बनाए रखते हैं, तो और अधिक जानें ही जाएंगी. हमें इस बात में संतोष नहीं करना चाहिए कि हमने 20 खोए, उन्होंने 40 खोए. यह न तो हमें और न ही उन्हें कोई फायदा पहुंचाता है. वे भी लोग हैं, हम भी लोग हैं. वे भी बढ़ना, समृद्ध होना और अच्छा जीवन जीना चाहते हैं; हम भी वही चीजें चाहते हैं.
जब ऐसा मामला हो, तो व्यापार जुड़ने का सबसे अच्छा तरीका है. वे हमारे देश में निवेश करते हैं, हम उनके देश में निवेश करते हैं- यह संबंध बनाने का सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि अगर हमारा निवेश किसी दूसरे देश में है, तो हम उस पर बमबारी नहीं करेंगे, और इसका उल्टा भी. यह कुछ ऐसा है जो हमें करना चाहिए- न केवल चीन के साथ, बल्कि पूरे एशिया और भौगोलिक रूप से जुड़े सभी देशों के साथ.
हम अभी खींची गई भौगोलिक सीमाओं को हटा नहीं सकते, लेकिन उन्हें धीरे-धीरे और अधिक सुगम बनाया जा सकता है ताकि लोग आसानी से आ-जा सकें और व्यापार, खासकर जमीनी व्यापार हो सके. इसके लिए, कनेक्टिविटी बनाना महत्वपूर्ण है. हमें चीन और मध्य एशिया के रास्ते से मॉस्को तक सड़कें, रेलवे और पाइपलाइन बनानी चाहिए, और अगर जरूरी हो, तो यूरोपीय राजधानियों तक भी. अगर अभी नहीं, तो अगले 25 वर्षों में, हमारे पास उचित कनेक्टिविटी होनी चाहिए. अगर हम ऐसा नहीं करते, तो यह एक-दूसरे के साथ कटुता, भय और अविश्वास में जीने की एक अंतहीन प्रक्रिया होगी।.
मुझे उम्मीद है कि यह समझ सभी तरफ के लोगों में आएगी और हम भौगोलिक रूप से एक इकाई के रूप में कार्य करने में सक्षम होंगे, भले ही हम राजनीतिक और अन्य तरीकों से अलग हों. भारत में पचास सर्वाधिक प्रभावशाली गिने जाने वाले लोगों में सद्गुरु एक योगी, दिव्यदर्शी और युगदृष्टा हैं और न्यूयार्क टाइम्स ने उन्हें सबसे प्रचलित लेखक बताया है.
2017 में भारत सरकार ने सद्गुरु को उनके अनूठे और विशिष्ट कार्यों के लिए पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है. वे दुनिया के सबसे बड़े जन-अभियान, जागरूक धरती- मिट्टी बचाओ के प्रणेता हैं, जिसने चार अरब लोगों को छुआ है.
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