N. Raghuraman’s column – Are we unable to hear the sweet sounds of nature amidst the beeping of machines? | एन. रघुरामन का कॉलम: क्या मशीनों की बीप-बीप में हम प्रकृति की मधुर ध्वनि नहीं सुन पा रहे?

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2 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
जब भी मेरी पत्नी हॉल में कोई सीरियल देख रही होती हैं और मुझे फ्रिज से कुछ खाने का मन करता है, तो मैं उलझन में पड़ जाता हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि मुझे अपने खाने की चीजें ढूंढने में 40 सेकंड लग जाते हैं। पहले 10 सेकंड तो ‘फ्रिज में क्या है’ जानने में निकल जाते हैं, क्योंकि घर में मैं ही उस मशीन का सबसे कम इस्तेमाल करता हू्ं।
दूसरे 10 सेकंड ‘अरे वाह, इस नई बोतल में क्या है’ में निकल जाते हैं, जिसे मेरी पत्नी हाल ही में अपने कुकिंग-कौशल के साथ प्रयोग करके मुझे सरप्राइज देने के लिए लाई थीं। चूंकि मुझे उनमें से कुछ मसाले समझ नहीं आते, इसलिए तीसरे 10 सेकंड ‘वो इस फ्रिज में क्या-क्या लाती और रखती हैं’ की आलोचना में निकल जाते हैं। बस तभी फ्रिज मुझे फटकारने लगता है! हैरान हो गए? आपका फ्रिज भी ऐसा ही करता होगा, लेकिन आप उसे नजरअंदाज करने लगे हैं।
वो असल में बीप करके हमें फटकारता है। ये उसका यह कहने का तरीका है कि ‘स्टुपिड, तुम मेरा दरवाजा कब तक खुला रखोगे, तुम्हें पता नहीं इससे कूलिंग का प्रभाव कम होता है और बिजली की खपत बढ़ती है। अगर भाभी ने मेरी पुकार सुन ली, तो वो दौड़कर भीतर चली आएंगी और तुम्हारी क्लास ले लेंगी।’
फिर मैं फटाफट आखिरी के 10 सेकंड में अपने खाने की चीजें निकालता हूं और दरवाजा बंद कर देता हूं, ताकि पत्नी का ध्यान मेरी तरफ न जाए।लेकिन आज हमारे चारों तरफ बीप-बीप-बीप की आवाजें गूंज रही हैं। हमारे मोबाइल से लेकर- जो हमें किसी के जन्मदिन या सालगिरह की याद दिलाता है- लिफ्ट के दरवाजे तक, सब कुछ बीप करता रहता है। जैसे हमारे पीछे किसी का लगातार हॉर्न बजाना उस आवाज को हमारे मन में किसी गाली जैसा बना देता है, उसी तरह ये बीप गालियों की तरह लगते हैं।
अगर हम अपने गुस्से को काबू में रख पाते हैं तो केवल इसलिए कि ये एक मशीन है और हम इसे डांट नहीं सकते। लेकिन क्या आप इस बात से सहमत नहीं हैं कि आज हमारी जिंदगी मशीनों के अनवरत रिमाइंडर्स से नियंत्रित होती है। माइक्रोवेव तब तक बीप करता रहता है, जब तक हम अंदर से गर्म चीज नहीं निकाल लेते। कार तब तक बीप करती रहती है, जब तक हम सीट बेल्ट नहीं लगा लेते।
वॉशिंग मशीन तब तक बीप करती रहती है, जब तक हम उसमें से सूखे कपड़े नहीं निकाल लेते। और मैं हमारे फोन की तो बात ही नहीं कर रहा, जो 365 दिन और 24 घंटे बीप करता रहता है! सबसे बुरी बीप जो मुझे परेशान करती है, वो है कार का दरवाजा थोड़ी देर खुला रखने के बाद बाहर निकलने में थोड़ा समय लगने पर होने वाली ध्वनि। लेकिन मैंने इसका हल ढूंढ लिया है।
मैंने कार से कहना शुरू कर दिया है कि ‘ओह, मेरी प्यारी, तुम नहीं चाहतीं कि मैं यहां से निकल जाऊं और तुम्हें अकेला छोड़ दूं? चिंता मत करो, मैं जल्द ही लौट आऊंगा,’ और इतना कहकर मैं दरवाजा बंद कर देता हूं। यह सुनकर कार में बैठे बाकी लोग जोर से हंस पड़ते हैं और इससे मेरे मन में बीप की आवाज का दर्द कम हो जाता है। लेकिन आज हमारे जीवन में जितने ज्यादा गैजेट्स हैं, उतनी ही ज्यादा बीप हैं।
आज मैं अपने गांव में हूं। मेरी साथी मेरी कार है। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला और ताजी हवा की खुशबू को महसूस करने लगा, मेरी कार ने बीप करना शुरू कर दिया। चहचहाती हुई चिड़ियाएं अचानक चुप हो गईं और समझने की कोशिश करने लगीं कि यह किसकी आवाज थी। मुझे पास के खेतों में अब तक टर्रा रहे मेंढकों की आवाज भी सुनाई देनी बंद हो गई।
सबसे बुरा अनुभव तो यह था कि सड़क पर चलते हुए या धान के खेतों में काम करते हुए बैलों की घंटियों की आवाज भी कार की बीप के बाद धीमी लगने लगी थी। शुक्र है कि जब मैंने लकड़ियां जलाकर उन पर अपनी कॉफी और डोसा बनाना शुरू किया, तो स्पैचुला और डोसा टर्नर ने ‘बहुत गर्म है!’ कहकर बीप नहीं किया।
फंडा यह है कि बिना बीप वाली जिंदगी के परिणामों के बारे में सोचना भी भयावह है, लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि हमारा रोजमर्रा का वातावरण हमारे उन गैजेट्स की रिमाइंडर-आवाजों से भरा है, जो प्रकृति की फुसफुसाहटों को हमसे छीन लेते हैं? इस पर अपने विचार मुझे जरूर लिख भेजें।
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