Saturday 30/ 08/ 2025 

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महाभारत कथा- ब्रह्नचर्य की प्रतिज्ञा के बाद भी स्वयंवर के लिए काशी क्यों गए थे भीष्म?


हस्तिनापुर के महल में सन्नाटा सा पसरा हुआ था. जनमेजय के नागयज्ञ को थमे कई दिन बीत चुके थे, लेकिन अपने पिता परीक्षित की अकाल मृत्यु के कारण राजा जनमेजय का शोक नहीं मिट सका था. इसी शोक के निदान के लिए महर्षि व्यास की आज्ञा से उनके शिष्य ऋषि वैशंपायन ने राजा जनमेजय को महाभारत का वृतांत सुनाना शुरू किया. राजन के लिए यह कथा जाननी इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि इसमें उनके ही पूर्वजों कौरव और पांडवों की गाथा थी, जो आपस में भाई ही थे. इसके साथ ही वे कुरुकुल के एक ही वंशवृक्ष की दो डालियों पर लगे फल की तरह थे. फिर उनके बीच ऐसा भीषण युद्ध हुआ जो न सिर्फ उनके कुरुवंश के महान योद्धाओं को लील गया बल्कि भारत वर्ष के कई राजवंशों को राजाविहीन कर गया था.

महाभारत की यह कथा कुरुकुल के सबसे बड़े सदस्य महात्मा भीष्म तक पहुंची तो उनके महान त्याग की कथा सुनकर राजा जनमेजय आश्चर्य में पड़ गया. उसने मन ही मन अपने पूर्वज महात्मा भीष्म को प्रणाम किया और फिर उसने बड़े ही विनीत स्वर में कहा- हे ऋषिवर वैशंपायन! कुरुकुल शिरोमणि भीष्म की भीषण प्रतिज्ञा के बाद क्या हुआ? हस्तिनापुर की वंशबेल कैसे आगे बढ़ी और इस महान राज्य के सिंहासन पर कौन बैठाया गया.

यह सुनकर ऋषि वैशंपायन बोले- हे भारत जनमेजय! आपने अच्छा प्रश्न किया है. अब मैं आपके ही प्रश्न के अनुसार कथा को आगे बढ़ाता हूं. फिर अपने गुरु महर्षि वेदव्यास को प्नणाम कर वैशंपायन ऋषि ने कहना शुरू किया. महाराज जनमेजय! देवी सत्यवती से दाशराज धीवर की शर्त और भीष्म प्रतिज्ञा के बाद महाराज शांतनु उन्हें विवाह कर राजधानी ले आए. हस्तिनापुर के राज सिंहासन पर देवी सत्यवती राजमहिषी (साम्राज्य में महारानी को दिया जाने वाला सबसे बड़ा पद) होकर महाराज शांतनु के बायीं ओर बैठीं. पृथ्वी पर इंद्र के समान भूषण राजा शांतनु ने कई वर्षों तक सुचारु रूप से राज्य किया.

प्रजा प्रसन्न थी. उसकी नजर में हस्तिनापुर अब चहुंओर से सुरक्षित था. भीतरी और बाहरी दोनों तरह के शत्रु पराजित थे. राज्य का वर्तमान सुदृढ़ हाथों में था और भविष्य की भी चिंता नहीं रह गई थी. देवव्रत भीष्म को जो इच्छामृत्यु का वरदान मिला था, तो प्रजा ऐसा समझती थी यह तो उसका ही रक्षा कवच है, क्योंकि जबतक भीष्म हैं, न्याय बना रहेगा. उन्होंने सिंहासन पर बैठने वाले हर व्यक्ति में पिता महाराज शांतनु की छवि देखने की सौगंध ली है, तो वह इस राज्य का रक्षण हमेशा पुत्र की ही तरह करते रहेंगे. वैशंपायन जी ने कहा- एक तरह से समझो प्रजा स्वार्थी ही हो गई. एक तरफ वह भीष्म के विवाह न करने और ब्रह्मचर्य अपनाने को लेकर सहानुभूति तो रखती थी, इसीलिए उनका सम्मान भी करती थी, लेकिन अंदर ही अंदर प्रजा को अपने लिए जीवन भर-आठों प्रहर का एक रक्षक मिल गया था, जो हस्तिनापुर की ओर आने वाली हर बाधा के आगे खड़ा था.


लेकिन महाराज जनमेजय! संकट हमेशा से सेना और शत्रु के रूप में तो नहीं आता. जब काल ही शत्रु बन जाए तो मनुष्य क्या करे? इस पर उसका कोई वश नहीं है. जनमेजय बोले- तो क्या हस्तिनापुर पर फिर कोई संकट आया? वैशंपायन जी बोले- नहीं राजन, लेकिन कथा सुनते हुए आप खुद इसे समझने का प्रयास करें. महाराज शांतनु सत्यवती से विवाह कर सुखपूर्वक जीवन बिताने लगे. जिस तरह उन्होंने कामातुर होकर सत्यवती से विवाह किया था उन्होंने उसे भोगा, लेकिन इस संबंध में वह अब केवल एक सामाजिक बंधन और दायित्व को निभा रहे थे. वह इस संबंध में होकर भी नहीं थे, लेकिन अपनी मन की स्थिति का पता वह किसी को भी नहीं चलने देते थे.

महाराज शांतनु नियम से ब्रह्नमुहूर्त में उठ जाते, शैय्या त्याग कर देते, उपासना आदि करते और फिर राजसभा चले जाते. राजकाज संभालते हुए प्रजा के सुख-दुख में दिन बिता डालते और जब भगवान भुवन भास्कर पश्चिम दिशा में कहीं ओझल हो जाते, तब वह शांत और मंथर गति (धीमी चाल) से रनिवास की राह लेते.

खुद देवी सत्यवती भी न जाने किस उधेड़बुन में कहीं खोई रहती थीं. उन्होंने महाराज से न कभी कोई प्रश्न किया न ही उन्हें अपनी ओर से कोई उलझन देने की चेष्टा ही की. समय बीतता गया, और देवी सत्यवती ने हस्तिनापुर राज्य में कुरुवंश के दो और दीपक जलाए. महाराज के पुत्रों के जन्म से प्रजा में हर्ष छा गया. सभी जगहों पर चित्रांगद और विचित्रवीर्य के जन्म की बधाई गाई जाने लगी. महाराज भी प्रसन्न थे, लेकिन उनका हृदय किसी अपराध से ग्रस्त भावना से दबा सा जाता था.

वह जब भी भीष्म की ओर देखते तो वह उन्हें ऐसी मूर्ति नजर आते जिसके साथ अन्याय हुआ था. भीष्म जब उन्हें प्रणाम करते तो शांतनु आशीर्वाद के लिए हाथ तो उठा देते लेकिन वह भी जानते थे कि इस महात्मा के आगे उनके सारे आशीष छोटे पड़ चुके हैं. महाराज खुद को भीष्म का अपराधी मानते थे और जब दोनों बार देवी सत्यवती ने पुत्रों को जन्म दिया तो महाराज शांतनु के हृदय में अंधकार और घिर गया.

वह शांत रहने लगे और शून्य में निहारते रहते. अभी उनके पुत्र अपने बालकपन से कुमार अवस्था में भी नहीं पहुंचे थे कि एक दिन इसी शून्य में निहारते हुए महाराज शांतनु को लगा कि काल ने उन्हें बुलवा लिया है, तो वह भीष्म के हाथों में अपने पुत्रों को सौंपकर और हस्तिनापुर की रक्षा का भार देकर स्वर्गलोक को सिधार गए.


देवी सत्यवती ने नियति और नीति का यही परिणाम था, ऐसा मानकर वैधव्य को ओढ़ा ओर भीष्म की देखरेख में पुत्रों का पालन करने लगीं. पिता का पिंडदान और उनकी प्रेतक्रिया कराने के बाद एक दिन कुमार अवस्था में ही देवी सत्यवती के बड़े पुत्र चित्रांगद का हाथ पकड़कर उन्हें सिंहासन पर बिठाया और विद्वानों-गुरुओं, महर्षियों से मुकुट पहनवाकर राज्याभिषेक कर दिया.

हस्तिनापुर के नरेश चित्रांगद कहलाने लगे और भीष्म ने उनके प्रतिनिधि के तौर पर राज्य को चारों दिशाओं से सुरक्षित बनाए रखा. उन्होंने देवी सत्यवती के दोनों पुत्रों अपने भाइयों चित्रांगद और विचित्रवीर्य को सभी तरह के रणकौशल की शिक्षा भी दी, फलस्वरूप दोनों ही अल्प अवस्था में ही महाबलशाली हो गए. महाराज चित्रांगद ने सीमाओं को जीतने और उन्हें बढ़ाने के बाद यक्षों और गंधर्वों पर भी विजय पायी. वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते थे.

उनके इसी अभिमान को देखते हुए एक दिन उनके ही नाम राशि वाला एक गंधर्व चित्रागंद हस्तिनापुर में आया और उसने महाराज को युद्ध के लिए ललकारा. महाराज चित्रांगद और गंधर्व चित्रांगद के बीच कुरुक्षेत्र में भीषण महायुद्ध हुआ. कभी वह मल्ल युद्ध करते, कभी गदायुद्ध से कौशल दिखलाते, कभी खड्ग से वार करते, धनुर्विद्या के तो कितने ही कौशल दोनों के बीच हुआ. इन दोनों का यह युद्ध तीन वर्ष तक होता रहा. अंततः एक दिन गंधर्व चित्रागंद ने हस्तिनापुर नरेश चित्रांगद को पराजित किया और उन्हें मार गिराया. नरेश चित्रांगद वीरगति को प्राप्त हुए.


हस्तिनापुर एक बार फिर राजाविहीन हो गया. तब भीष्म ने अपने भाई की सभी अंतिम क्रिया आदि कराने के बाद देवी सत्यवती के दूसरे पुत्र विचित्रवीर्य को सिंहासन पर बैठाया. विचित्रवीर्य भी बलशाली थे और उन्होंने नीति और कुशलता के साथ कई वर्षों तक राज्य किया. वह भीष्म के आज्ञाकारी थे और भीष्म ने भी उनकी हर प्रकार से रक्षा की. इस तरह कई दिन बीतने पर भीष्म ने यह जाना कि अब कुमार विचित्रवीर्य युवावस्था में प्रवेश कर चुके हैं. इसलिए उनका विवाह किया जाना चाहिए.

यह विचार वह माता सत्यवती से भी प्रकट कर चुके थे. उन्हीं दिनों काशीराज की तीन अप्सरा जैसी कन्याओं का स्वयंवर होने वाला था. वह एक ही साथ राजाओं के समूह में से अपने-अपने लिए पति चुनने वाली थीं. यह सूचना पाकर रथियों में सर्वश्रेष्ठ भीष्म सिर्फ एक रथ लेकर काशी पुरी के लिए चल पड़े. वहां भीष्म उन सभी राजाओं की पंक्तियों में जा मिले, जहां वे सभी वरे जाने की अभिलाषा में खड़े थे.

उधर एक-एक राजा का परिचय दिया जा रहा था और कन्याएं हाथ में वरमाला लेकर उस परिचय को सुन रही थीं. मन के उपयुक्त परिचय न जानकर वह आगे बढ़ जाती थीं. इसी तरह काशीराज की तीनों कन्याओं ने भीष्म को देखा और उन्हें अकेला और अपने से बहुत बड़ा, बुजुर्ग मानकर आगे बढ़ गईं. उन्होंने समझा की भीष्म जी तो बूढ़े हैं. इधर, अन्य राजाओं ने यह सब देखा तो वह हंसी-ठिठोली करने लगे. कहने लगे कि यह तो बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञा करके भीष्म कहलाते थे. अब बाल सफेद होने और झुर्रियां पड़ने के बाद यह बूढ़ा लज्जा छोड़कर यहां क्यों आया है. कोई कहने लगा कि प्रतिज्ञा सिर्फ पिताजी के स्वर्गवासी होने की प्रतीक्षा में थी. वह गए तो प्रतिज्ञा ने भी अपनी राह ली और यह आ गए विवाह रचाने.

यह सब देख-सुनकर कुरुकुल भूषण भीष्म को रोष आ गया. तब उन्होंने आगे बढ़कर सभी राजसमाज को जीतकर तीनों ही कन्याओं को रथ पर चढ़ा लिया और गरज कर बोले- सभी भूपालों सुनो! विद्वानों ने कन्या को यथाशक्ति आभूषणों से अलंकृत करके गणमान्य वर को बुलाकर, उसे कुछ धन देने के साथ ही कन्यादान करना उत्तम (ब्राह्म विवाह) बताया है. कुछ लोग एक जोड़ा गाय और बैल देकर कन्यादान करते हैं, यह आर्ष विवाह है. कई लोग निश्चित धन लेकर कन्यादान करते हैं यह आसुर विवाह है. कुछ लोग बलपूर्वक कन्या का हरण करके विवाह करते हैं यह राक्षस विवाह है.


कुछ लोग वर और कन्या की परस्पर सहमति होने पर विवाह करते हैं यह गंधर्व विवाह है. कुछ लोग अचेत अवस्था में पड़ी कन्या को उठा ले जाते हैं जो कि पिशाच विवाह है. कुछ लोग वर और कन्या को एकत्र करके उनसे संकल्प कराते हैं कि वह दोनों गृहस्थ धर्म का पालन करेंगे. फिर कन्या का पिता दोनों की पूजा करके, अलंकारयुक्त कन्या को वर के लिए दान करता है. यहा प्रजापत्य विवाह है.

कुछ लोग आर्ष विधि यानी यज्ञ करके ऋत्विज ऋषियों को कन्या दान देते हैं. इस प्रकार विवाहित होने वाले (दैव विवाह की रीति से) पत्नी प्राप्त करते हैं. इस तरह विद्वानों ने इसे विवाह का आठवां प्रकार माना है. क्षत्रिय स्वयंवर की प्रशंसा करते हैं और उसमें जाते हैं, लेकिन उसमें भी समस्त राजाओं को परास्त करके जिस कन्या का अपहरण किया जाता है, धर्मवादी विद्वान क्षत्रिय के लिए इसे भी श्रेष्ठ मानते हैं. इसलिए यहां उपस्थित सभी राजाओं सुनो! मैं इन कन्याओं को यहां से बलपूर्वक हर ले जा रहा हूं. तुम लोग अपनी समस्त शक्ति लगाकर विजय या पराजय के लिए मुझे रोकने का प्रयास करो.

ऐसा कहकर भीष्म अपने रथ पर चढ़े और काशी से जाने लगे. तब सभी राजा खुद को अपमानित मानते हुए और भीष्म के वचनों का उत्तर देने के लिए एक साथ मिलकर उनके विरुद्ध आ डटे. इस तरह काशी का वह मार्ग युद्धभूमि की तरह बन गया. सभी ने अपने-अपने आभूषण उतार फेंके और जल्दी-जल्दी कवच पहनने लगे. कितनों के आभूषण टूट-टूट कर बिखरने लगे.

ऐसा लगता था कि आसमान से तारे टूटकर गिर पड़ते हों. इस तरह कुछ कवच पहने-कुछ नहीं पहने सारा राज समाज अपने-अपने रथों में चढ़ता हुआ भीष्म के पीछे दौड़ा. वैशंपायन जी बोले- महाराज जनमेजय! जब राजाओं ने भीष्मजी को पीछे से ललकारा तो कुरुकुल के वीर भीष्म रुके. राजाओं के समाज ने उन पर आक्रमण कर दिया. इस तरह अब वहां भीषण संग्राम छिड़ गया. भीष्म अकेले थे और सारा राज समाज एक साथ. फिर भी भीष्म के बाणों का वह उत्तर नहीं दे पाते थे.

इस असंतुलित पक्ष में रोंगटे खड़े कर देने वाला भीषण और रोमांचक युद्ध होने लगा. भारत के राजाओं और राजकुमारों जिन्होंने अब तक कुरुवंशी भीष्म के पराक्रम की सिर्फ कथाएं सुनीं थी, वह आज उसे प्रत्यक्ष देख रहे थे. सभी राजाओं ने मिलकर भीष्म पर दस हजार बाण एक साथ चलाए. ऐसा लगा कि बाणों की वर्षा ही हो, लेकिन भीष्म जी ने उत्तर में पंखों वाला ऐसा बाण चलाया कि वह आकाश में जाकर रक्षा कवच बन गया और शत्रु के सभी बाण खाली गए. इससे बौखलाए राजाओं ने एक के बाद एक बाण चलाए. सभी राजा एक बार में एक बाण चला सकते थे, लेकिन भीष्म फुर्ती से हर दिशा में एक-बार में पांच बाण चला रहे थे.

वह एक-एक बाण से दो राजाओं के बाण काटते थे और तीन बाणों से हर राजा को उसी स्थान पर अचल कर देते थे. इसी तरह भीष्म ने फुर्ती से दो-दो बाण और चलाए और सभी विरोधी योद्धाओं को वहीं बींध दिया. किसी के धनुष कट गए. कोई हिल नही सकता था. किसी के रथ का चक्का टूट गया. किसी का छत्र उसके ऊपर ही गिर गया और किसी के तरकश तो किसी के कवच कट-टूट कर नीचे गिर गए. राजाओं की बड़ी संख्या बिना शस्त्रों की और असहाय हो गई.


तब इनमें से कई विरोधी राजा जो अब तक भीष्म जी से लड़ रहे थे उनके रण कौशल को देखकर साधो-साधो (बहुत अच्छा-बहुत अच्छा) कहने लगे और कई ने दांतों तले उंगली दबा ली कि वह तो उन्हें वृद्ध समझ रहे थे, लेकिन महात्मा भीष्म तो रणकौशल में अब भी युवा हैं. उनकी बाघ जैसी फुर्ती उन्हें अजेय बनाती है. इस तरह प्रशंसा करके और भीष्म से पराजित सभी राजाओं ने रथ को दूसरी दिशा में मोड़ लिया और वहां से चले गए. कन्याओं को इस तरह युद्ध में जीतकर महात्मा भीष्म आगे बढ़ चले.

वह आगे बढ़े ही थे कि शाल्वराज ने उन्हें सेना सहित फिर से ललकारा. शाल्वराज की ललकार सुन भीष्म फिर से युद्ध के लिए आ डटे, लेकिन इस बार अन्य राजा ने सिर्फ दर्शकों की भूमिका में ही रहे. शाल्वराज ने भीष्म पर आक्रमण किया और भीष्म ने कुछ देर उनके आक्रमणों के उत्तर में सिर्फ अपना बचाव किया.

तब सभी राजाओं ने वाह शाल्वराज कहकर उनकी प्रशंसा की. यह सुनकर शाल्वकुमार ने उत्साह में भीष्म पर और भीषण आक्रमण किया. तब महात्मा भीष्म ने शाल्वकुमार के रथ के घोड़ों का दमन कर डाला, उसके सारथि को मार डाला और रथ को भी तोड़कर हर तरह से शाल्व का मानमर्दन करके उसे सिर्फ जीवित छोड़ दिया. शाल्वराज अब निहत्था था, इसलिए भीष्म ने उन्हें जीवन दान दिया और लौट जाने को कहा. इस तरह शाल्व समेत सभी राजाओं पर विजय पाकर महात्मा भीष्म ने तीनों कन्याओं के साथ हस्तिनापुर की राह ली.

उन्होंने राजधानी पहुंचकर तीनों ही कन्याएं माता सत्यवती की सेवा में सौंप दी और उनसे नियत तिथि देखकर तीनों से ही छोटे भाई नरेश विचित्रवीर्य का विवाह करवाने की प्रार्थना की. सत्यवती भीष्म की बात मानकर विवाह की तैयारियों के लिए सेवकों को आदेश देने लगीं.

यह सब अभी हो ही रहा था कि तभी काशी नरेश की बड़ी कन्या जिसका नाम अंबा था, वह आगे आईं. उसने सुना कि देवव्रत भीष्म अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य से उसका विवाह करेंगे तो वह साध्वी सत्यवती की ओर देखकर भीष्म से बोली- हे धर्मात्मा! मैंने पहले से ही मन ही मन सौभ नामक विमान के अधिपति राजा शाल्व को पति के रूप में वरण कर लिया था. उन्होंने भी पूर्वकाल में मेरा वरण किया था. मैं स्वयंवर में भी उन्हें ही चुनने वाली थी और इसमें मेरे ही पिता की भी सम्मति थी. पिताजी की इच्छा थी कि मेरा विवाह शाल्व के साथ हो. हे धर्मज्ञ! इन सभी बातों को सोच-समझकर जो धर्म कहे, वैसा ही कीजिए.

उस कन्या जब यह बात ब्राह्मण मंडली के बीच कही तो इसे सुनकर भीष्म ने सत्यवती की ओर देखकर और विचार करके कहा, माता! फिर तो इसका विवाह हस्तिनापुर नरेश के साथ नहीं हो सकता है. ऐसा कहकर भीष्म ने सम्मान सहित अंबा को उसी समय शाल्व के यहां जाने की अनुमति दे दी. इसके बाद भीष्म ने उसकी दो छोटी बहनों जिनका नाम अंबिका और अंबालिका था, शास्त्रविधि से उनका विवाह महाराज विचित्रवीर्य से कर दिया.


दोनों कन्याओं ने महाराज से विवाह किया और जब देखा कि उन्हें उनके अनुरूप ही सुंदर और यौवन से परिपूर्ण कुमार महाराज पति रूप में मिले हैं तो दोनों बहुत प्रसन्न हुईं. विचित्रवीर्य का रूप अश्विनी कुमारों के समान था. वह पराक्रमी थे, रण में कुशल थे, युद्ध में शत्रुओं को जीत लेने और एकांत में, प्रेम में स्त्रियों को मोहित कर लेने के शक्ति रखते थे. इस तरह रति (कामदेव की पत्नी) जैसी दो सुंदर 16 वर्ष की कन्याओं को पत्नी रूप में पाकर महाराज विचित्रवीर्य आनंद से भर गए. वह यौवन की हर परिभाषा से संपन्न थीं और प्रेम में भी माहिर थीं. उन पत्नियों के साथ महाराज ने सात वर्ष तक प्रेम विहार किया. वह संयम भूल गए और असंयम के कारण वह राजयक्ष्मा (आज इसे टीबी कहा जाता है) रोग के शिकार हो गए.

उनका समय रहते बहुत उपचार किया गया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ और इस तरह महाराज विचित्रवीर्य बिना संतान उत्पन्न किए और अपनी दो पत्नियों को विधवा कर मृत्यु को प्राप्त हो गए. राजमहल में युवा महारानियों का विलाप गूंज उठा. देवी सत्यवती और महात्मा भीष्म शोक में डूब गए. हस्तिनापुर में एक बार फिर अंधकार छा गया.

पहला भाग : कैसे लिखी गई महाभारत की महागाथा? महर्षि व्यास ने मानी शर्त, तब लिखने को तैयार हुए थे श्रीगणेश 
दूसरा भाग :
राजा जनमेजय और उनके भाइयों को क्यों मिला कुतिया से श्राप, कैसे सामने आई महाभारत की गाथा?
तीसरा भाग : राजा जनमेजय ने क्यों लिया नाग यज्ञ का फैसला, कैसे हुआ सर्पों का जन्म?
चौथा भाग : महाभारत कथाः नागों को क्यों उनकी मां ने ही दिया अग्नि में भस्म होने का श्राप, गरुड़ कैसे बन गए भगवान विष्णु के वाहन?
पांचवा 
भाग : कैसे हुई थी राजा परीक्षित की मृत्यु? क्या मिला था श्राप जिसके कारण हुआ भयानक नाग यज्ञ
छठा भाग : महाभारत कथाः  नागों के रक्षक, सर्पों को यज्ञ से बचाने वाले बाल मुनि… कौन हैं ‘आस्तीक महाराज’, जिन्होंने रुकवाया था जनमेजय का नागयज्ञ
सातवाँ भाग : महाभारत कथाः तक्षक नाग की प्राण रक्षा, सर्पों का बचाव… बाल मुनि आस्तीक ने राजा जनमेजय से कैसे रुकवाया नागयज
आठवाँ भाग : महाभारत कथा- मछली के पेट से हुआ सत्यवती का जन्म, कौन थीं महर्षि वेद व्यास की माता?
नौवां
भाग : महाभारत कथा- किस श्राप का परिणाम था विदुर और भीष्म का जन्म, किन-किन देवताओं और असुरों के अंश से जन्मे थे कौरव, पांडव
दसवाँ भाग : महाभारत कथाः न दुर्वासा ने दिया श्राप, न मछली ने निगली थी अंगूठी… क्या है दुष्यंत-शकुंतला के विवाह की सच्ची कहानी
ग्यारहवाँ भाग : महाभारत कथाः हस्तिनापुर की वंशावली, कुलवधु कैसे बनीं देवनदी गंगा? जानिए शांतनु के साथ विवाह की पूरी कहानी
बारह
वाँ भाग :
अपने ही बच्चों को क्यों डुबो देती थीं गंगा, आठ नवजात राजकुमारों में कैसे जीवित रह गए हस्तिनापुर के पितामह भीष्म?


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