N. Raghuraman’s column – Fake education and improper upbringing affect decency in society | एन. रघुरामन का कॉलम: फर्जी शिक्षा और अनुचित परवरिश समाज में शालीनता को प्रभावित करती है

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7 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
जो लोग यूएस ओपन टेनिस चैंपियनशिप देख रहे हैं, संभवत: उन्होंने लातविया की जेलेना ओस्टापेंको और अमेरिका की टेलर टाउनसेंड के बीच आमने-सामने की बहस देखी होगी। यह दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय चार खेल आयोजनों में से एक है।
इस बुधवार कुछ खेल प्रेमियों ने कोर्ट 11 पर शायद वो नाटकीय घटनाक्रम देखा होगा, जिसमें जेलेना जोर से बोलीं, नाराज हुईं और कथित तौर पर चीखीं। बाद में टेलर ने कहा कि जेलेना ने उनसे कहा कि उनके पास “कोई शिक्षा नहीं है, इसलिए उनका कोई दर्जा नहीं है।’ जीतने के बाद टेलर ने कहा कि “मुझे गर्व है कि मैंने गुस्से के बजाय अपने रैकेट को बोलने दिया।’ हालांकि, मैंने उनकी सटीक बातचीत नहीं देखी, लेकिन मीडिया रिपोर्टों ने उनके बीच तीखी बातचीत की पुष्टि की है।
उनकी शिक्षा और पृष्ठभूमि की जानकारी से अनजान मैं सोच रहा था कि उनके बीच क्या हुआ होगा। तभी मोबाइल पर जयपुर से खबर आई : “हाई कोर्ट ने पेपरलीक मामले में 859 पदों के लिए हुई सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा-2021 को रद्द कर दिया है।’
राजस्थान हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय में गड़बड़ी वाली परीक्षा को लेकर राज्य सरकार के बचाव की आलोचना की। अदालत ने कहा “इस भर्ती को जारी रखना असंभव है।’ न्यायाधीश समीर जैन ने कहा राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) के छह सदस्य उस गोपनीय प्रश्न-पत्र को लीक करने में शामिल थे, जो बाद में पूरे प्रदेश में “ब्लूटूथ गिरोहों’ के पास पहुंच गया। जज ने इसे “व्यापक धांधली’ बताते हुए कहा कि जनता के हितों की रक्षा का जिम्मा संभालने वाले आरपीएससी सदस्यों ने “भरोसे से विश्वासघात का विकल्प चुना।’
अदालत ने अनुचित तरीकों से भर्ती हुए लोगों को सब इंस्पेक्टर के तौर पर सेवा की अनुमति में छिपे जोखिम को बताते हुए कहा कि यह जनता के विश्वास और सुरक्षा के लिए हानिकारक होगा। कोर्ट ने अब आरपीएससी में “प्रक्रियागत कदाचार’ को सुधारने और पहले नियुक्त हो चुके अभ्यर्थियों पर पड़ने वाले प्रभाव के समाधान के लिए पूरी भर्ती प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव का आदेश दिया है। कोर्ट ने उनका भी ध्यान रखा, जिन्होंने इस पद पर जॉइन करने के लिए अन्य सरकारी नौकरियों से इस्तीफा दिया था। राज्य सरकार को ऐसे उम्मीदवारों की मूल नौकरियों में बहाली के निर्देश दिए।
रोचक यह है कि जब इस रैकेट का खुलासा हुआ तो राजस्थान पुलिस अकादमी में ट्रेनी सब इंस्पेक्टरों के पूरे बैच को उन्हीं सवालों को फिर हल करने के लिए कहा गया। इसमें कई टॉपर विफल हुए। जो महिला अभ्यर्थी 200 अंकों में से हिंदी में 188.68 और सामान्य ज्ञान में 154.84 अंक लाई थी, री-टेस्ट में हिंदी में केवल 24 और सामान्य ज्ञान में 34 सवालों के ही सही जवाब दे पाई।
हिंदी में 183.75 और सामान्य ज्ञान में 167.89 (कुल 351.64) अंक लाकर 11वीं रैंक पाने वाली एक अन्य महिला टॉपर री-टेस्ट में हिंदी के 52 और सामान्य ज्ञान के 71 प्रश्नों के ही सही उत्तर दे सकी। मूल परीक्षा में हिंदी में 168.28 और सामान्य ज्ञान में 157.59 अंक लाने वाला एक अन्य प्रशिक्षु दूसरी बार में हिंदी में 49 और सामान्य ज्ञान में 62 अंक ही ला पाया। कभी रोल मॉडल के तौर पर सराहे गए 2021 की परीक्षा के टॉपर ने भी लीक प्रश्नपत्रों और डमी उम्मीदवार का सहारा लिया था। शायद इसीलिए जस्टिस जैन ने कहा कि “घर का भेदी लंका ढाए।’
यह जरूरी नहीं कि किसी को शिक्षा नहीं मिली तो वह शालीन व्यवहार नहीं करेगा। इसी तरह, पढ़ा-लिखा होना भी बेहतर बर्ताव की गारंटी नहीं। लेकिन व्यापक संदर्भ में आदर्श रूप से कहें तो शिक्षा से शालीनता और अच्छा व्यवहार बढ़ता है। क्योंकि यह अच्छी सोच को बढ़ावा देती है, जिससे सार्वजनिक या निजी तौर पर कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
फंडा यह है कि शिक्षा से अच्छे इरादों को बढ़ावा मिलता है, लेकिन खराब परवरिश के साथ “फर्जी’ शिक्षा उस अच्छे इरादे को दूषित कर देती है। शिक्षा की कमी से जरूरी नहीं वैसा ही हो, जैसा कई लोग मानते हैं, क्योंकि कभी-कभी अच्छी परवरिश इसकी भरपाई कर देती है। इसीलिए हम अपने समाज में कई ऐसे लोगों को देखते हैं, जिनके पास औपचारिक शिक्षा नहीं है- फिर भी वे अच्छे नागरिक हैं।
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